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महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का आधिकारिक दर्जा नहीं, RTI के जवाब में सरकार ने कहा

शाहजहांपुर (यूपी). 'सब उन्हें राष्ट्रपिता कहते हैं, लेकिन भारत सरकार ने न तो उन्हें इसकी कोई उपाधि दी है और न ही आधिकारिक रूप से दर्जा। सुभाष चंद्र बोस ने सबसे पहले उन्हें यह संबोधन दिया था, जिसके बाद सभी उन्हें राष्ट्रपिता कहने लगे।'

यह जानकारी संस्कृति मंत्रालय की गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की ओर से आरटीआई के जवाब में दी गई है। गुरुनानक पाठशाला कन्या हाई र्स्कूल के प्रबंधक गुरुप्रकाश सिह ने इसी साल 27 जून को जन सूचनाधिकार के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से जानकारी मांगी थी।

जवाब में 30 अगस्त को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के प्रशासनिक अधिकारी शाहिद अहमद जमाल ने बताया है भारत सरकार ने इस संबंध में कोई भी नियम या अध्यादेश पारित नहीं किया है।

1944 में रेडियो रंगून से दिया था संबोधन

सरकार की ओर से दिए जवाब में कहा गया है कि 1915 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने सबसे पहले गांधीजी को महात्मा कहा था। जबकि 1944 मे रेडियो रंगून से संबोधन के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा था।

महात्मा कहे जाने का निर्णय बरकार

शाहिद अहमद जमाल के मुताबिक, इस संबंध में एक याचिका गुजरात हाई कोर्ट में दायर की गई थी। जिसमें 19 फरवरी 2016 को गुजरात हाई कोर्ट ने रवींद्रनाथ टैगोर के गांधी जी को महात्मा कहे जाने के निर्णय को बरकरार रखा।

वहीं इस बारे में इतिहासकार डॉ. एनसी मेहरोत्रा का कहना है, महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन के सर्वेसर्वा थे। उनका योगदान सबसे ज्यादा था। जिस तरह जय प्रकाश नारायण को लोकनायक, बाल गंगाधर तिलक को लोकमान्य का संबोधन दिया गया, ठीक उसी तरह महात्मा गांधी के योगदान को देखते हुए उन्हें राष्ट्रपिता कहकर बुलाया गया।

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