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सियासत में विनेश के कितना काम आएगा ओलंपिक का सहानुभूति फैक्टर, जहां से लड़ने की बात वहां कैसे समीकरण?

कुश्ती खिलाड़ी विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया ने शुक्रवार को राजनीति में प्रवेश कर लिया। दोनों ने कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल की उपस्थिति में कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया। इससे पहले विनेश ने रेलवे की अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात की। कांग्रेस में शामिल होने के साथ ही विनेश और बजरंग के हरियाणा विधानसभा चुनाव में उतरने की अटकले लग रही हैं। आइये इस राजनीतिक प्रवेश के चुनावी मायने को समझते हैं.

राजनीति में तो आ गए क्या चुनाव भी लड़ेंगे विनेश और बजरंग?
कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी महसचिव केसी वेणुगोपाल ने विनेश और बजरंग को पार्टी में शामिल कराया। इस दौरान दोनों से चुनाव लड़ने के बारे में पूछा गया। इस सवाल के जवाब में केसी वेणुगोपल ने कहा कि टिकट का फैसला सीईसी करती है। उसे ही करने दीजिए। वहीं, पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि आज शाम या कल तक स्थिति साफ हो जाएगी।

विनेश से जब पूछा गया कि आपके दादरी या जुलाना से चुनाव लड़ने की अटकलें हैं आप कहां से लड़ना चाहेंगीं। इस पर विनेश ने कहा कि एक मेरी जन्मभूमि है और दूसरी मेरी कर्मभूमि है। दरअसल विनेश का मायका दादरी विधानसभा में पड़ता है वहीं, जुलाना विधानसभा में उनका ससुराल पड़ता है। वहीं, बजरंग ने इस सवाल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बजरंग के बादली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की अटकले हैं।

क्या ओलंपिक की सहानभूति का फायदा होगा?
हरियाणा की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकार कहते हैं कि ओलंपिक मेडल चूकने के बाद विनेश को लेकर सहानभूति है। कुश्ती संघ के खिलाफ धरने के दौरान जो हुआ उसको लेकर भी लोगों के मन में पहलवानों के प्रति साहनभूति थी। मेडल प्रकरण ने इसे विनेश के लिए और बढ़ा दिया है। अगर विनेश को कांग्रेस टिकट देती है तो उन्हें इस सहानभूति का फायदा मिल सकता है। ये अलग बात है कि यह फायदा निर्णायक साबित होता है या नहीं यह आठ अक्तूबर को पता चलेगा। जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आएंगे।
2019 में इन सीटों पर कैसे रहे थे नतीजे?
दादरी और जुलाना दोनों ही जाट बहुल सीटें है। 2019 के विधानसभा चुनाव में दादरी सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार सोमवीर सांगवान ने जीत दर्ज की थी। जाट समुदाय से आने वाले सोमवीर सांगवान ने जजपा के सोमवीर सांगवाग को 14,272 वोट से हराया था। इसी सीट पर भाजपा उम्मीदवार और विनेश की चचेरी बहन बबीता फोगाट तीसरे नंबर पर रहीं थी। दिलचस्प ये है कि सांगवान अब कांग्रेस में आ चुके हैं। सांगवान दादरी सीट से पार्टी से टिकट की दावेदारी पेश कर रहे हैं। उनका दावा है कि पार्टी उन्हें ही टिकट देगी और अगर पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो वो एक बार फिर से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरेंगे।

इसी तरह जुलाना भी जाट बहुल विधानसभा सीट है। 2019 में यहां से जजपा के अमरजीत ढांडा जीते थे। ढांडा एक बार फिर यहां से जजपा उम्मीदवार हैं। उन्होंने इनेलो के परमिंद सिंह को हराया था। परमिंदर 2009 और 2014 में यहां से जीते थे। जुलाना विधानसभा क्षेत्र में विनेश का ससुराल पड़ता है। कहा जा रहा है कि उनके परिवार ने क्षेत्र में अभी से विनेश के लिए समर्थन जुटाने की कवायद शुरू कर दी है।

बजरंग पूनिया के बादली सीट से चुनाव लड़ने की अटकलें हैं। 2019 में यहां से कांग्रेस के कुलदीप वत्स जीते थे। उन्होंने भाजपा के ओपी धनखड़ को हराया था। धनखड़ 2014 में यहां से विधायक रह चुके हैं। भाजपा ने एक बार फिर से उन्हें बादली सीट से उम्मीदवार बनाया है। वहीं, बजरंग की एंट्री के बाद कुलदीप वत्स का टिकट कटने की अटकलें हैं। वत्स इससे नाराज बताए जा रहे हैं।
क्या खिलाड़ियों को चुनावी राजनीति में उतरने का फायदा मिलता है?
यह बात हर खिलाड़ी के लिए लागू नहीं की जा सकती है। 2019 के विधानसभा चुनाव में विनेश की चचेरी बहन बबीता फोगाट भी दादरी सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरी थीं। हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इसी तरह पूर्व ओलंपिक पदक विजेता पहलवान योगेश्वर दत्त भी चुनाव मैदान में उतरे लेकिन सफल नहीं रहे थे। इन दोनों के अलावा भाजपा के टिकट पर उतरे पूर्व हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह पिहोवा सीट से जीतने में सफल रहे थे। यानी, सिर्फ खिलाड़ी होना जीत या हार की गारंटी नहीं कहा जा सकता है।
कुश्ती संघ के खिलाफ जो मोर्चा विनेश-बजरंग ने खोल रखा था उसका क्या होगा?
कुश्ती संघ खिलाफ हुआ आंदोलन में बजरंग और विनेश के साथ ओलंपिक पदक विजेता पहलवान साक्षी मलिक भी शामिल थीं। अपने दोनों साथियों के कांग्रेस में शामिल होने की खबर के बाद साक्षी ने कहा कि कुश्ती संघ और बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ उनकी लड़ाई अभी भी जारी है। उन्होंने कहा, "ये उनका (बजरंग और विनेश का) व्यक्तिगत फैसला है कि वो राजनीति में जा रहे है। मेरा मानना ये है कि हमें कहीं न कहीं त्याग कर देना चाहिए। हमारे आंदोलन को गलत रूप नहीं दिया जाए। मैं अब भी उस पर डटकर खड़ी हूं। रेसलिंग में महिलाओं से जो शोषण होता था वो जेनविन है। मेरी तरफ से आंदोलन अभी भी जारी है। मैं हमेशा से रेसलिंग के लिए सोचती रही हूं और उसके लिए काम करती रही हूं और हमेशा करती रहूंगी। मेरे पास भी ऑफर आए हैं, लेकिन मैंने जो शुरुआत की है उसे अंत तक लेकर जाऊंगी जब तक फेडरेशन क्लीन नहीं हो जाता तब तक में डटकर लड़ती रहूंगी।

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