जन-ऋषि पंडित दीनदयाल उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ को शतà¥-शतॠनमन - शिवराज सिंह चौहान
à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ दरà¥à¤¶à¤¨ में मनà¥à¤·à¥à¤¯ की चेतना की सरà¥à¤µà¥‹à¤šà¥à¤š अवसà¥à¤¥à¤¾ वह मानी जाती है, जहां वह समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ सृषà¥à¤Ÿà¤¿ को सà¥à¤µà¤¯à¤‚ के à¤à¥€à¤¤à¤° और सà¥à¤µà¤¯à¤‚ को समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ सृषà¥à¤Ÿà¤¿ के à¤à¥€à¤¤à¤° अनà¥à¤à¤µ करता है। पà¥à¤¨à¥‡-लिखने और कहने-सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ में यह बात बहà¥à¤¤ आती है, लेकिन इसे जो वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ वासà¥à¤¤à¤µà¤¿à¤• रूप से महसूस कर लेता है, वह देवतà¥à¤²à¥à¤¯ हो जाता हैं। à¤à¤•ातà¥à¤® मानववाद दरà¥à¤¶à¤¨ के पà¥à¤°à¤£à¥‡à¤¤à¤¾ पंडित दीनदयाल उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ à¤à¤¸à¥‡ ही महापà¥à¤°à¥à¤· थे।
कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। महापà¥à¤°à¥à¤·à¥‹à¤‚ में बचपन से ही कà¥à¤› विलकà¥à¤·à¤£à¤¤à¤¾ होती है। पंडितजी के बचपन का à¤à¤• बड़ा पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤• पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग हैं। उनकी किशोर अवसà¥à¤¥à¤¾ थी। वह सबà¥à¤œà¥€ लेने बाजार गये और सबà¥à¤œà¥€ बेचने वाली वृदà¥à¤§à¤¾ को चवनà¥à¤¨à¥€ का à¤à¥à¤—तान कर दिया। घर लौटते समय उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जेब टटोली तो, देखा कि वह वृदà¥à¤§à¤¾ को खोटी चवनà¥à¤¨à¥€ दे आये हैं। उनका मन इतना दà¥à¤ƒà¤–ी और दà¥à¤°à¤µà¤¿à¤¤ हो गया कि वह दौड़ते हà¥à¤ उस वृदà¥à¤§à¤¾ के पास गये और उससे कà¥à¤·à¤®à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤°à¥à¤¥à¤¨à¤¾ के साथ खोटी चवनà¥à¤¨à¥€ वापस लेकर उसे खरी चवनà¥à¤¨à¥€ दे दी।
महापà¥à¤°à¥à¤· à¤à¤¸à¥‡ ही होते हैं। वे सà¥à¤µà¤¯à¤‚ कितने à¤à¥€ कषà¥à¤Ÿ उठा लें, लेकिन अपने कारण दूसरों को कषà¥à¤Ÿ नहीं होने देते। जीवनà¤à¤° सादगी की पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤®à¥‚रà¥à¤¤à¤¿ रहे पंडित दीनदयाल उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯, डॉ. शà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤¾à¤ªà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ मà¥à¤–रà¥à¤œà¥€ के सरà¥à¤µà¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¯ वैसे ही नहीं बन गये थे। शिकà¥à¤·à¤¾ में हमेशा अवà¥à¤µà¤² रहने वाले पंडितजी की बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ विलकà¥à¤·à¤£ रूप से कà¥à¤¶à¤¾à¤—à¥à¤° थी। लेकिन कà¥à¤¶à¤¾à¤—à¥à¤° बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ से कोई महापà¥à¤°à¥à¤· नहीं बनता। चितà¥à¤¤ की निरà¥à¤®à¤²à¤¤à¤¾ का मेल होने पर ही वह जनकलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤•ारी सोच की ओर अगà¥à¤°à¤¸à¤° होता है। बहà¥à¤¤ वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ करने वाले पंडित उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ सिरà¥à¤« किताबी जà¥à¤žà¤¾à¤¨ से समà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ नहीं थे। जिस वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के पास सà¥à¤µà¤¯à¤‚ की अंतःपà¥à¤°à¤œà¥à¤žà¤¾ नहीं होती, उसके लिठशासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ का कोई अरà¥à¤¥ नहीं। पंडितजी के पास अंतःपà¥à¤°à¤œà¥à¤žà¤¾ थी। इसी के कारण वह मौलिक रूप से चिंतन कर सके। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने धरà¥à¤®, अरà¥à¤¥à¤¶à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥à¤°, अधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®, समाज, वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ सहित सà¤à¥€ विषयों पर मौलिक चिनà¥à¤¤à¤¨ कर सारà¥à¤¥à¤• निषà¥à¤•रà¥à¤· हमारे सामने रखे। पंडितजी की जितनी गति à¤à¤• आदरà¥à¤¶ मूलक राजनीति में थी, उतनी ही साहितà¥à¤¯ में à¤à¥€, à¤à¤• ही बैठक में चंदà¥à¤°à¤—à¥à¤ªà¥à¤¤ नाटक लिख लेना उनकी साहितà¥à¤¯à¤¾à¤à¤¿à¤°à¥à¤šà¤¿ का पà¥à¤°à¤®à¤¾à¤£ ही नहीं था, बलà¥à¤•ि इस बात का à¤à¥€ कि सरहदों को सà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¿à¤¤ रखने और देश के राजनीति à¤à¤•ीकरण के लकà¥à¤·à¥à¤¯ उनकी नज़र में कितने जरूरी थे।
पंडितजी à¤à¤¾à¤°à¤¤ के विकास के लिठà¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ चिंतन को ही आधार बनाना चाहते थे। वे कहते थे कि हम लोगों ने अंगà¥à¤°à¥‡à¤œ शासन में अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥€ वसà¥à¤¤à¥à¤“ं का विरोध कर हरà¥à¤· महसूस किया था, लेकिन यह आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯ की बात है कि अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥‹à¤‚ के जाने के बाद हम उनà¥à¤¹à¥€à¤‚ का अनà¥à¤¸à¤°à¤£ कर रहे हैं। पशà¥à¤šà¤¿à¤®à¥€ विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ और पशà¥à¤šà¤¿à¤®à¥€ जीवन दो अलग-अलग चीजें हैं। पशà¥à¤šà¤¿à¤®à¥€ विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ बहà¥à¤¤ सारà¥à¤µà¤à¥Œà¤®à¤¿à¤• है और अगर हमें आगे बà¥à¤¨à¤¾ है तो इसे जरूर अपनाना चाहिà¤à¥¤ लेकिन जीवन मूलà¥à¤¯ हमारे ही होने चाहिà¤à¥¤ सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ को लेकर उनका मानना था कि यह तà¤à¥€ सारà¥à¤¥à¤• होती है, जब यह हमारी संसà¥à¤•ृति की अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ का साधन बन जाये। à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति की विशेषता यह है कि यह जीवन को à¤à¤• विशाल और समगà¥à¤° रूप में देखती है। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने राजनीति में संसà¥à¤•ृति का संचार किया। वह सही अरà¥à¤¥à¥‹à¤‚ में जन-ऋषि थे।
पंडितजी कहते थे कि à¤à¤• ही चेतना समसà¥à¤¤ जड़चेतन में विराजमान है। इसलिठहम सबके है, सब हमारे है। मनà¥à¤·à¥à¤¯ केवल शरीर नहीं शरीर के साथ-साथ मन à¤à¥€ हैं, बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ à¤à¥€, आतà¥à¤®à¤¾ à¤à¥€à¥¤
मनà¥à¤·à¥à¤¯ को पूरी तरह से सà¥à¤–ी रखना है तो शरीर के साथ-साथ मन, बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ और आतà¥à¤®à¤¾ के सà¥à¤– का à¤à¥€ विचार करना होगा। केवल à¤à¥Œà¤¤à¤¿à¤• पà¥à¤°à¤—ति नहीं, आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• उनà¥à¤¨à¤¤à¤¿ का à¤à¥€ विचार करना होगा।
पंडितजी अनेकता में à¤à¤•ता और विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ रूपों में à¤à¤•ता की अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ की à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ सोच को निरंतर आगे बà¥à¤¾à¤¨à¥‡ के पकà¥à¤·à¤§à¤° थे। उनका मानना था कि मानव के मन, बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ और मसà¥à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤• का समनà¥à¤µà¤¿à¤¤ रूप से विकास होना चाहिà¤à¥¤ इनमें से किसी à¤à¤• ही पकà¥à¤· के विकास पर जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ बल देने से मनà¥à¤·à¥à¤¯ का समगà¥à¤° विकास संà¤à¤µ नहीं है। अà¤à¥€ जिस कोà¤à¥€à¤•ोड में हमारी राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯ कारà¥à¤¯à¤•ारिणी की बैठक हो रही है, वहाठ50 साल पहले हजारों कारà¥à¤¯à¤•रà¥à¤¤à¤¾à¤“ं को संबोधित करते हà¥à¤ शà¥à¤°à¥€ दीनदयालजी ने कहा था हम किसी विशेष समà¥à¤¦à¤¾à¤¯ या वरà¥à¤— की नहीं संपूरà¥à¤£ देश की सेवा के लिठपà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¬à¤¦à¥à¤§ है, हर देशवासी हमारे रकà¥à¤¤ का रकà¥à¤¤ और हमारी मजà¥à¤œà¤¾ की मजà¥à¤œà¤¾ है, हम तब तक चैन की सांस नहीं लेंगे जब तक कि हम हर à¤à¤• को गरà¥à¤µ का यह बोध दे सकें कि वे à¤à¤¾à¤°à¤¤ माठकी संतान हैं।
मà¥à¤à¥‡ इस बात पर संतोष हैं कि विगत 11-12 वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ से मधà¥à¤¯à¤ªà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ में हम पंडित दीनदयाल उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ के दरà¥à¤¶à¤¨ को आधार बनाकर अपनी योजनाà¤à¤‚ निरà¥à¤®à¤¿à¤¤ और कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤¨à¥à¤µà¤¿à¤¤ कर रहे हैं। पंडितजी कहते थे कि हमारी पà¥à¤°à¤—ति का आकलन सामाजिक सीà¥à¥€ के सरà¥à¤µà¥‹à¤šà¥à¤š पायदान पहà¥à¤‚चे वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ से नहीं बलà¥à¤•ि सबसे निचले पायदान पर खड़े वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ से होगा।
हमने पंडितजी के इसी चिंतन को आधार बनाकर समाज के निचले से निचले सà¥à¤¤à¤° तक लोगों की बेहतरी के लिठकाम किया। आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¤¿à¤• औषधालयों में काम करने वाले कमà¥à¤ªà¤¾à¤‰à¤‚डर हों या घरों में काम करने वाली बहनें, सà¥à¤•ूल के अंशकालिक लिपिक हों या सफाई करà¥à¤®à¤šà¤¾à¤°à¥€, à¤à¥‚मिहीन कोटवार, आंगनवाडी कारà¥à¤¯à¤•रà¥à¤¤à¤¾, सहायिका, होमगारà¥à¤¡, मजदूर, हमà¥à¤®à¤¾à¤², तà¥à¤²à¤¾à¤µà¤Ÿà¥€, रोजनदार मजदूर, बà¥à¤œà¥à¤°à¥à¤— शà¥à¤°à¤®à¤¿à¤•, बोà¤à¤¾ ढोने वाले मजदूर, गà¥à¤®à¤Ÿà¥€ वाले, खेतीहर मजदूर सहित समाज के सबसे कमजोर वरà¥à¤—ों के जीवन में खà¥à¤¶à¤¹à¤¾à¤²à¥€ लाने का हमने पूरा पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है। पंडितजी की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾à¤“ं को योजनाओं में बदलने का हमारा यह पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ लगातार जारी रहेगा।
आइये, महामानव पंडित दीनदयाल उपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ के जनà¥à¤®à¤¶à¤¤à¤¾à¤¬à¥à¤¦à¥€ वरà¥à¤· में हम समाज के कमजोर वरà¥à¤—ों के हित में शà¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ तमॠकाम करने के अपने संकलà¥à¤ª को और मजबूत करें। सà¥à¤µà¤¯à¤‚ में दूसरों को देखें और दूसरों को सà¥à¤µà¤¯à¤‚ में à¤à¤• ही चेतना या आतà¥à¤® को चराचर जगतॠमें अनà¥à¤¸à¥à¤¯à¥‚त देखें। यही हमारी पंडितजी को सचà¥à¤šà¥€ शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾à¤‚जलि होगी।